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रविवार, 16 जुलाई 2017

'मुगले-आजम' के रचयिता k.आसिफ का जीवन परिचय K. Asif's book introduces the life of 'Mughle-Azam'

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'मुगल-ए-आजम'
महज आठवीं जमात तक पढ़े थे. पैदाइश से जवानी तक का वक्त गरीबी में गुजारा था. फिर उन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी, भव्य और सफल फिल्म का निर्माण किया. यह इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि उन्हें सिर्फ इतना पता था कि उनकी फिल्म के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा
हम बात कर रहे हैं फिल्म इंडस्ट्री के महान डायरेक्टर्स में से एक करीमुद्दीन आसिफ की, जिन्हें लोग के. आसिफ के नाम से जानते हैं और वह फिल्म थी ‘मुगल-ए-आजम’.
'मुगले-आजम' के रचयिता k.आसिफ का जीवन परिचय K. Asif's book introduces the life of 'Mughle-Azam'

करीमुद्दीन आसिफ का जन्म 14 जून, 1922 को हुआ था और 9 मार्च, 1971 को वह इस दुनिया से रुख्सत हो गए. इस मौके पर हम बता रहे हैं ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़े कुछ किस्से और फिल्म निर्माण को लेकर के. आसिफ का नजरिया. नोश फरमाइए.
ये महान फिल्म 5 अगस्त, 1960 को रिलीज हुई थी. इसके प्रीमियर के लिए बंबई के मराठा मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया था और आसिफ खुद मेहमानों का स्वागत कर रहे थे. प्रीमियर में ओमप्रकाश, मुकरी, शम्मी कपूर, गीता बाली, नादिरा, राजेंद्र कुमार, सुरैया, शोभना समर्थ, वहीदा रहमान, गुरुदत्त, देवानंद, बिमल रॉय, जय किशन, लता मंगेशकर, माला सिन्हा, मीना कुमारी, कमाल अमरोही और जॉय मुखर्जी जैसे दिग्गज आए थे. राज कपूर तो उसी दिन बर्लिन से लौटे थे. 19वीं शताब्दी के मशहूर पारसी नेता सर काउसजी जहांगीर पहली बार कोई भारतीय फिल्म देखने आए थे.
प्रीमियर देखकर किसी ने आसिफ से कहा कि फिल्म के डायलॉग बहुत ही कठिन उर्दू में हैं, लोगों को समझ नहीं आएंगे. आसिफ ने जवाब दिया कि हर फिल्म की अपनी जुबान होती है. लोगों को समझना होगा, तो वो समझ लेंगे.
ये किस्सा सुनाते हुए समीक्षक जय प्रकाश चौकसे बताते हैं कि फिल्म के एक सीन में अकबर ‘यलगार हो’ बोलते हैं और सेना लड़ने के लिए दौड़ पड़ती है. ये शब्द इतना प्रचलित हुआ कि बाद में गुजरात तक में लोग इसका इस्तेमाल करते सुने गए.
डायलॉग
‘यलगार’ से याद आया, ‘मुगल-ए-आजम’ के संवाद लिखने के लिए आसिफ ने चार लोगों से संपर्क किया था. इसके डायलॉग कमाल अमरोही, वजाहत मिर्जा, अहसान रिजवी और अमानउल्लाह खान ने मिलकर लिखे थे. ये चारों लोग मुगल इतिहास के जानकार थे.
बताते हैं कि के. आसिफ को इस फिल्म का आइडिया 1944 में आया था. वो तब से इस पर काम कर रहे थे, लेकिन शूटिंग जैसे बड़े काम शुरू हुए 1950 के बाद. इतने लंबे समय तक एक ही प्रॉजेक्ट से जुड़े रहना मुश्किल है. इस विकसित तकनीक के जमाने में भी ‘बाहुबली’ बनने में पांच साल का वक्त लगा. सबसे ज्यादा परेशानी तो प्रोड्यूसर को संभालने में आती है. आखिर कौन होगा, जो लगातार 16 सालों तक पैसे देता रहेगा. ये आसिफ की लगन ही थी, जिससे फिल्म तैयार हुई. और जो तैयार हुई, लोग आज भी उसके दीवाने हैं.
शूटिंग के समय जब आसिफ को कुछ कमजोर लगने लगता था (सेट से लेकर संवाद, अभिनय और प्रॉपर्टी तक), वो शूटिंग रोक देते. शीशमहल का सेट बनने की वजह से फिल्म दो साल रुकी रही. दिलीप कुमार के लिए सोने के जूते बनने और एक सीन के लिए मोती इकट्ठे करने के लिए भी फिल्म रुकी रही.
इस फिल्म के प्रोड्यूसर थे शपूरजी पलौंजी मिस्त्री, जिन्हें सिनेमा बिल्कुल पसंद नहीं था. वो फिल्में नहीं देखते थे, लेकिन नाटक देखने के शौकीन थे और इसके लिए अक्सर ओपेरा हाउस जाया करते थे, जहां पृथ्वीराज कपूर के नाटक होते थे. पृथ्वीराज के. आसिफ के साथ फिल्म ‘फूल’ में काम कर चुके थे. पृथ्वीराज आसिफ के हुनर से परिचित थे. तो उन्होंने ही शपूरजी से कहा, ‘आपके पास बहुत पैसा है और आपके जैसा ही आसिफ जैसे पागल आदमी को फाइनेंस कर सकता है. पता नहीं कितने साल और कितना पैसा लगे, पर मैं इतना यकीन से कह सकता हूं कि वो फिल्म अभूतपूर्व बनाएगा.’
पृथ्वीराज के कहने पर शपूरजी फिल्म के फाइनेंसर बने और तब फिल्म को निर्बाध पैसा मिलना शुरू हुआ. वैसे शपूरजी के इंट्रेस्ट के पीछे एक कहानी ये भी है कि शपूरजी अकबर की शख्सियत के दीवाने थे. आसिफ तो सलीम-अनारकली की मोहब्बत के कायल थे, जिसकी वजह से उन्होंने फिल्म बनाना शुरू किया, लेकिन शपूरजी का इंट्रेस्ट अकबर की वजह से जगा था. हालांकि, शपूरजी फिल्म के इकलौते फाइनेंसर नहीं थे. आसिफ ने इन 16 सालों में जो भी कमाया, सब इसी फिल्म में लगा दिया.
‘मुगल-ए-आजम’ का मकबूल गाना ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ शीशमहल में शूट किया गया था. पहले ये सेट साधारण शीशों को काटकर बनाया जा रहा था, लेकिन के. आसिफ को लगा कि इन शीशों से वह मन-मुताबिक आकर्षण पैदा नहीं कर पाएंगे, तो उन्होंने बेल्जियम से खास तरह के शीशे मंगवाए. मोहन स्टूडियो में बने इस 200 फीट लंबे, 80 फीट चौड़े और 35 फीट ऊंचे सेट में 10 लाख की लागत आई थी और बनने में 2 साल का वक्त लगा था. तब तक शूटिंग रुकी रही.
रोचक बात ये है कि फिल्म बनाने से पहले पूरी फिल्म का बजट ही 10 लाख रुपए का रखा गया था. उतना तो अकेले इस सेट में लग गया. पूरी फिल्म में करीब डेढ़ करोड़ रुपए का खर्च आया. शीशमहल का सेट बनने के बाद इसकी लाइटिंग करने में भी टेक्नीशियन्स को छींके आ गई थीं. विदेशी टेक्नीशियन्स तक ने हाथ खड़े कर दिए थे. फिर कैमरामैन आरडी माथुर की मदद से सेट की लाइटिंग मुमकिन हुई. वो टेक्निकल कहानी है.
सेट देखने विदेशों से आते थे मेहमान
‘मुगल-ए-आजम’ के सेट की खूबसूरती की इतनी चर्चा हुई कि देशभर से लोग इन्हें देखने आते थे. अहिस्ता-अहिस्ता बात जब देश के बाहर गई, तो कई विदेशी मेहमान भी सेट की भव्यता देखने भारत आए. इनमें अफगानिस्तान और सउदी अरब के शाही मेहमान, नेपाल के वजीर-ए-आजम, इटली के मशहूर डायरेक्टर रॉबर्तो रोज़ेलिनी और इंग्लैंड के बड़े फिल्ममेकर डेविड लीन शामिल हैं. चीन का कल्चरल डेलिगेशन भी सेट देखने आए थे और बेहद खुश हुआ.
सेट ही नहीं, फिल्म भी देखने आए
के. आसिफ ने ये फिल्म इतनी शानदार, बेमिसाल, लाजवाब बनाई थी कि लोग इसे देखने विदेशों से आते थे. हिंदुस्तानी तो इस कदर दीवाने हो गए थे कि टिकट की बिक्री से पहले दो-दो मील लंबी लाइनें लगाकर खड़े हो जाते थे. रजा मुराद बताते हैं कि कइयों ने तो सड़क पर बिस्तर ही डाल लिया था. वो फुटपाथ पर सोते थे और घरवालों से वहीं खाना मंगाते थे, ताकि टिकट लेकर फिल्म देख सकें.
मराठा मंदिर सिनेमाहॉल में दो टिकट विंडो होती थीं. एक भारतीयों के लिए और दूसरी उनके लिए, जिनके पास पासपोर्ट होते थे. यानी विदेशी. पाकिस्तान से तो न जाने कितने लोग ये फिल्म देखने आए थे.
‘मुगल-ए-आजम’ में इस्तेमाल हुआ एक-एक लिबास, जंगी कपड़े, ढालें, तलवारें और जेवर वगैरह पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही तैयार किया गया था और वो किसी मायने में अकबरी जमाने से कमतर नहीं था. बंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में जब इस साजो-सामान की नुमाइश लगी, तो इसे देखने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था.
इंडियन सिनेमा में ऐसे डायरेक्टर्स कम ही हुए हैं, जो फिल्म के हर हिस्से पर इतना ध्यान दें. सबसे बड़ी बात तो विजन है. न जाने कितने डायरेक्टर्स तरसते हैं कि वो ‘मुगल-ए-आजम’ की भव्यता का 100वां हिस्सा भी अपनी फिल्म में दिखा पाए. आसिफ सोच सकते थे और फिर उसे उतनी ही इंटेंसिटी से दिखा भी सकते थे.
मोतियों की बारिश के लिए मंगाए असली मोती, फिल्म में एक सीन है, जब सलीम 14 साल बाद वापस आते हैं. उनके स्वागत में महल में मोतियों की बारिश करवाई जाती है. पहले तो शूटिंग में आर्टीफीशियल मोती इस्तेमाल हुए, लेकिन वो जमीन से टकराते ही टूट जाते थे. मन-मुताबिक काम न होते देख आसिफ ने असली मोतियों की मांग की और जब तक हजारों मोती इकट्ठे नहीं हो गए, शूटिंग रुकी रही. आसिफ कहते थे कि असली मोतियों के जमीन पर गिरने से जो खनक और खुशी मिलती है, उन्हें वही चाहिए और वो वही हासिल करके माने.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसा शायद ही किसी फिल्म के लिए हुआ हो. फिल्म में सलीम के महल लौटने वाले सीन में एक रास्ता दिखाया गया है, जहां सलीम और उनके साथ सैकड़ों सैनिक महल की तरफ बढ़ते हैं. ये सीन राजस्थान के किसी भी पुराने इलाके में शूट किया जा सकता था, लेकिन आसिफ को वो रास्ता इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं शूटिंग करने का फैसला लिया. इसके लिए उन्होंने सरकार, नेताओं और अधिकारियों के साथ काफी मशक्कत की और आखिरकार उस रास्ते में लगे बिजली के सारे खंभे हटवा दिए गए.
‘मुगल-ए-आजम’ का म्यूजिक नौशाद ने कंपोज किया था. जब आसिफ ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’ गाना लेकर नौशाद के पास गए, तो बस इतना ही बोले, ‘क्लासिक होना चाहिए ये’. नौशाद ने जवाब किया, ‘कोशिश करेंगे’. नौशाद की कोशिश इतना रंग लाई कि आसिफ को कहना पड़ा, ‘अहा! फर्स्ट क्लास.’ जब आसिफ को गाना जंच गया, तो नौशाद ने उनसे कहा, ‘इसमें कोई फिल्मी डांस मास्टर (कोरियोग्राफर) मत लीजिएगा.’
फिर इस गाने की कोरियोग्राफी के लिए नौशाद लच्छू महाराज को आसिफ के पास ले गए. गाना सुनकर लच्छू महाराज रोने लगे. तब आसिफ ने नौशाद को किनारे लेकर कहा, ‘अमां वल्लाह ये क्या ड्रामा है. ये डांस का गाना है और ये बैठे रो रहे हैं’. इस पर नौशाद ने बताया, ‘वाजिद अली शाह के दरबार में इनके बाप जो थे, ये आस्ताई उनकी थी. आस्ताई उनकी ली है मैंने.’ इस पर आसिफ बच्चे की तरह खुश होकर बोले, ‘अरे फिर तो क्लासिक है.’ फिर लच्छू महाराज ने इस गाने पर मधुबाला को नचाया.

जब नौशाद ने ‘मुगल-ए-आजम’ बनानी शुरू की थी, तभी फिल्मिस्तान स्टूडियो ने ‘अनारकली’ नाम की एक फिल्म बनाकर रिलीज कर दी. फिल्म चल भी गई. तो कुछ लोग आसिफ के पास आए और बोले कि अब आपका क्या होगा. इस पर आसिफ ने बड़े आत्मविश्वास और गर्व से कहा, ‘वो उनकी फिल्म है. मैं अपनी फिल्म अपने ढंग से बना रहा हूं.’ इसके बाद क्या हुआ, सब जानते हैं.

आसिफ की ये बात उनका पूरा व्यक्तित्व बयां करती है. वो असल जिंदगी में इतने ही कॉन्फिडेंट थे. न तो उन्होंने बहुत पढ़ाई की थी और न फिल्ममेकिंग का कोई कोर्स. सिर्फ दो ही फिल्में हैं, जो वो पूरी बना पाए. उन्हें अपने काम और काम के लिए अपनी समझ पर भरोसा था. वो उन पैमानों से परे थे कि कोई बड़ा एक्टर है या कोई बड़ा डायरेक्टर है. उनके सामने सब बराबर थे. वो जितना सोचते थे, उसे वैसा ही दिखाने के लिए जी-जान एक कर देते थे. ‘मुगल-ए-आजम’ के निर्माण के दौरान न जाने कितनी ऐसी रातें गुजरीं, जब आसिफ मोहन स्टूडियो में चटाई पर सोए. वो फिल्म नहीं बनाते थे, तपस्या करते थे.

जब फिल्म सिनेमाहॉल में लगने की बारी आई, तो डिस्ट्रीब्यूटर मदन कोठारी ने आसिफ से कहा कि ये कोई ऑर्डिनरी फिल्म तो है नहीं, तो इसके टिकट भी साधारण नहीं होने चाहिए. आसिफ ने कहा, ‘छपवा लीजिए.’ आसिफ की मंजूरी के बाद ऐसे टिकट छपवाए गए, जिसमें फिल्म का पोस्टर भी था. ये टिकट मराठा मंदिर और मुंबई के कुछ दूसरे सिनेमाघरों में बेचे गए. तब इन्हें छापने की लागत 85 हजार आई थी, जो आज के वक्त में करीब 25 लाख होती.

आसिफ को अपने सामने देखने वाले लोग उनकी दो बातों का जिक्र हमेशा करते हैं. एक तो उनके पढ़े-लिखे न होने का और दूसरा उनकी सिगरेट पीने की अदा का. वो मुट्ठी बांधकर सिगरेट पीते थे, जैसे अक्सर रिक्शेवाले या चिलम पीने वाले पीते हैं. उनका शरीर बड़ा था. भारी-भरकम. चौड़ी छाती और कंधों वाला. दिल भी उनका उतना ही बड़ा था. दो-ढाई सौ लोगों की यूनिट के साथ काम करते थे. उनके साथ काम करने वाला हर शख्स उनकी तारीफ करता था. महज 48 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था.
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