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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

घर पर बनाये स्वास्थ्य वर्धक गुणकारी शराब वाइन -Salutary healthy home made wine wine -

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घर पर बनाये स्वास्थ्य वर्धक गुणकारी शराब वाइन -Salutary healthy home made wine wine -वाइन के फायदे-रेड वाइन के लाभ-बीयर बनाने की विधि-बियर कैसे बनती है-रेड वाइन प्राइस-खमीर क्या है-बीयर पीने के फायदे-रेड-आप घर पे ही ईएसआई शराब बना सकते है जो बहुत ही अच्छी होती है हमारे शरीर के लिए और ये सद्यो से बनाई जा रही है -
घर पर बनाये स्वास्थ्य वर्धक गुणकारी शराब वाइन -Salutary healthy home made wine wine -

आवश्यक सामग्री-

 ट्रॉपिकाना १००% रेड ग्रेप जूस (४ लीटर), ताजा अंगूर (२५० ग्राम), चीनी या शहद (४०० ग्राम), एक अच्छी तरह से बंद हो सकने वाला प्लास्टिक का जरीकेन (५ लीटर)
अन्य वैकल्पिक सामग्री: रेड वाइन यीस्ट, वाइन कार्बोय
किण्वन समय: २ से ३ सप्ताह
परिपक्वन समय: २ से ६ माह
तैयार रेड वाइन: ४ लीटर
एल्कोहॉल प्रतिशत: १० से १२ % (विशिष्ट घनत्व द्वारा अनुमानित परिमाण)
लागत: ७० से १०० रु प्रति ७५० मिली लीटर

यहाँ बताई गयी विधि का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ वाइन नहीं बल्कि सबसे आसानी से बनाई जा सकने वाली औसत वाइन है। अंगूर को मसलकर उससे रस निकालने की झंझट से बचने के लिये एक सरल उपाय है कि बाजार में उपलब्ध परिष्कृत रेड ग्रेप जूस (जैसे ट्रॉपिकाना, रियल, फ्रेशगोल्ड आदि) प्रयोग किया जाय। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जूस में कोई भी प्रिज़र्वेटिव नहीं मिला हो और अच्छे परिणाम के लिये १००% फ्रूट जूस ही प्रयोग करें। सामान्यतया जूस में १५० से १६० ग्राम प्रति लीटर शर्करा होती है। जबकि किण्वन के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में एल्कोहॉल बनने के लिये मातृद्रव में शर्करा की मात्रा लगभग २५० ग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इसकी आपूर्ति जूस में उपयुक्त मात्रा में चीनी या शहद मिला कर पूरी की जा सकती है। प्रयोग में लाई जाने वाली सभी वस्तुओं की सफाई का ध्यान देने की विशेष आवश्यकता होती है। इसके लिये पूरे प्रक्रम में केवल स्वच्छ जल (आर. ओ. वाटर यदि उपलब्ध हो तो) प्रयोग में लायें। सर्वप्रथम सभी बर्तनों को गर्म पानी से धो लें। तत्पश्चात ४ लीटर जूस और ४०० ग्राम चीनी या शहद को ५ ली के प्लास्टिक के जरीकेन में डालकर अच्छी तरह से हिलाए ताकि शर्करा भली भाँति घुल जाय। शहद यद्यपि चीनी से महंगा होता है परन्तु अपेक्षाकृत बेहतर वाइन बनाता है। अब इसमें यदि उपलब्ध हों तो वाइन यीस्ट अथवा कुछ ताजे धुले हुये अंगूर मसलकर कर दाल दें और एक बार फिर से अच्छी तरह से हिलायें। अंगूर की खाल में जंगली यीस्ट होता है जो कि रस के किण्वन में भाग लेता है। इसके बाद जरीकेन को अच्छी तरह से बंद कर दें ताकि हवा अंदर न जा सके; साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि किण्वन के फलस्वरूप बनाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड धीरे धीरे रिस कर बाहर निकल सके। किण्वन के लिये उपयुक्त तापमान १८ से २४ डिग्री सेंटीग्रेड होता है अतः पात्र को अँधेरे व ठन्डे स्थान पर किण्वन के लिये रख दें। २ से ४ दिन के भीतर किण्वन शुरू हो जाता है और कार्बन डाई ऑक्साइड के बुलबुले और द्रव सतह पर उपस्थित झाग देखा जा सकता है। हर २-३ दिन में पात्र का अवलोकन करते रहें और यह सुनिश्चित कर लें कि कार्बन डाई ऑक्साइड गैस बाहर निकल पा रही है। करीब ३ सप्ताह में गैस के बुलबुले दिखना बंद हों जाते हैं और उसके करीब १ सप्ताह बाद यानि कुल १ माह के बाद प्राथमिक किण्वन संपन्न हो जाता है। अब वाइन को प्लास्टिक के पात्र से साइफन द्वारा निकाल कर (ताकि नीचे बैठा अवसाद विचलित न हो) काँच की बोतलों में परिपक्वन के लिये रखा जा सकता है। किण्वन के दौरान बना एल्कोहॉल परिपक्वन के समय वाइन में बची शर्करा व अन्य अवयवों से घुल मिलकर एक अच्छी वाइन को जन्म देता है। परिपक्वन के लिये भी सामान ठन्डे और अँधेरे वातावरण का प्रयोग करना चाहिए। परिपक्वन का समय न्यूनतम २ माह से अधिकतम ६ माह तक हो सकता है। इससे अधिक समय तक परिपक्वन से वाइन के ऑक्सीकरण का खतरा रहता है जिसके फलस्वरूप वाइन सिरके (Vinegar) में परिवर्तित होने लगती है और पीने योग्य नहीं बचती। नीचे दिए गए चित्र में किण्वन पात्र और परिपक्वन के रखी गयी बोतलें देखी जा सकती हैं।



किण्वन और परिपक्वन के पश्चात तैयार वाइन के उपभोग से पूर्व एक और गुणवत्ता परीक्षण की आवश्यकता है। सर्वप्रथम इसे सूंघकर देखें कि इसमें से वाइन की ही महक आ रही है अन्य कोई तीखी, आपत्तिजनक या सड़न की नहीं। यदि सब ठीक है तो फिर इसका स्वाद लेकर देखें। सामान्यतः होने वाली कमियों में से प्रमुख हैं वाइन का अधिक मीठा होना, अधिक खट्टा होना या खराब स्वाद होना। वाइन अधिक मीठी होने का कारण है किण्वन पूरा होने से पूर्व ही यीस्ट निष्क्रिय हों जाना, इस वाइन को पीने योग्य बनाने के लिये इसमें स्वच्छ जल मिलायें। वाइन के खट्टे होने का कारण इसका ऑक्सीकरण है जिससे बचने के लिये सम्पूर्ण प्रक्रम में वाइन के वायु से संपर्क को न्यूनतम रखना चाहिए। स्वाद खराब होने का अर्थ है कि किण्वन के दौरान यीस्ट के अतिरिक्त अन्य बैक्टीरिया भी पनपने लगा है, इससे बचने कि लिये सफाई का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।

स्वादिष्ट पकवान बनाने की भाँति ही वाइन बनाना भी एक कला है जिसमें महारथ पाने के लिये कई प्रयोग और सतत रूचि एवं विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार रेसेपी पढ़ कर सभी लोग एक बार में शेफ नहीं बन जाते उसी प्रकार वाइन बनाने में भी पारंगत पाने के लिये कई प्रयास करने होते हैं। सफलता की कुंजी हैं रूचि, लगन और विश्वास। इसी विधि के प्रयोग से अन्य बिना खट्टे (non-citrus) फलों जैसे सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, बेर, आड़ू, लीची इत्यादि की वाइन भी बनाई जा सकती है।
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